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Tuesday, December 2, 2008

दिल मे उजले काग़ज पर "राही मासूम रजा"

दिल मे उजले काग़ज पर हम कैसा गीत लिखें
बोलो तुम को गैर लिखें या अपना मीत लिखें

नीले अम्बर की अंगनाई में तारों के फूल
मेरे प्यासे होंठों पर हैं अंगारों के फूल
इन फूलों को आख़िर अपनी हार या जीत लिखें

कोई पुराना सपना दे दो और कुछ मीठे बोल
लेकर हम निकले हैं अपनी आंखों के कश-कोल
हम बंजारे प्रीत के मारे क्या संगीत लिखें

शाम खड़ी है एक चमेली के प्याले में शबनम
जमुना जी की उंगली पकड़े खेल रहा है मधुबन
ऐसे में गंगा जल से राधा की प्रीत लिखें

मन चाहे यह "अनिल जनविजय"

नहीं
दिल नहीं करता अब
यहाँ विदेश में रहने का

मन चाहे यह
मैं अपने भूखे-नंगे
जन-गण के पास जाऊँ

कष्ट में है जो पीड़ा में
है दुश्मन के फेरे में
साम्प्रदायिकता के घेरे में
तकलीफ़देह, घुटन भरे हैं दिन
उन्होंने डुबो दिया मेरे जन-गण को
मन्दिर-मस्ज़िद के अँधेरे में

काल है यह बदतर अन्यायी
उजाले पर
फिरी हुई है स्याही
निराशा भरे इस विकट समय में
साथ उसका निभाऊँ
मैं अपने जन-गण के पास जाऊँ

Monday, December 1, 2008

पुष्प की अभिलाषा "माखनलाल चतुर्वेदी"

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

Saturday, May 24, 2008

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे ... "ठाकुरप्रसाद सिंह"


पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

साखू की डाल पर उदासे मन
उन्मन का क्या होगा
पात-पात पर अंकित चुम्बन
चुम्बन का क्या होगा
मन-मन पर डाल दिए बन्धन
बन्धन का क्या होगा
पात झरे, गलियों-गलियों बिखरे

कोयलें उदास मगर फिर-फिर वे गाएंगी
नए-नए चिन्हों से राहें भर जाएंगी
खुलने दो कलियों की ठिठुरी ये मुट्ठियाँ
माथे पर नई-नई सुबहें मुस्काएंगी

गगन-नयन फिर-फिर होंगे भरे
पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

यह मेरे जीवन का जल "ठाकुरप्रसाद सिंह"


यह मेरे जीवन का जल
कमल-पात पर हिम-बूंदों-सा टलमल रे
कितना चंचल

इसीलिए तो
खाता चल
पीता चल
गाता चल
चल रे चल
थोड़े ही दिन का यह छल
यह मेरे जीवन का जल

ताराओं के हास से
चन्दरिमा के पास से
आया है आकाश से
पा सकें तो पा सकें
जा रहा है हाथ से
हो रहा देखो ओझल

यह मेरे जीवन का जल

Thursday, May 22, 2008

जीवन, यह मौलिक महमानी "माखनलाल चतुर्वेदी"


जीवन, यह मौलिक महमानी!

खट्टा, मीठा, कटुक, केसला
कितने रस, कैसी गुण-खानी
हर अनुभूति अतृप्ति-दान में
बन जाती है आँधी-पानी

कितना दे देते हो दानी
जीवन की बैठक में, कितने
भरे इरादे दायें-बायें तानें स्र्कती नहीं भले ही
मिन्नत करें कि सौहे खायें!

रागों पर चढ़ता है पानी।।
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऊब उठें श्रम करते-करते
ऐसे प्रज्ञाहीन मिलेंगे
साँसों के लेते ऊबेंगे
ऐसे साहस-क्षीण मिलेगे

कैसी है यह पतित कहानी?
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऐसे भी हैं, श्रम के राही
जिन पर जग-छवि मँडराती है
ऊबें यहाँ मिटा करती हैं
बलियाँ हैं, आती-जाती हैं।

अगम अछूती श्रम की रानी!
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

Friday, April 25, 2008

एक ऐसा गीत गाना चाहता हूँ मैं
ख़ुशी हो या ग़म, बस मुस्कुराना चाहता हूँ मैं !
दोस्तो से दोस्ती तो हर कोई निभाता है
दुश्मनो को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूँ मैं !
जो हम उड़े उँचाई पर अकेले तो क्या नया किया,
साथ में हर किसी के पंख फैलाना चाहता हूँ मैं !
वो सोचते हैं की मैं अकेला हूँ उनके बिना,
तन्हाईया साथ में मेरे इतना बताना चाहता हूँ मैं !
ये खुदा तमन्ना बस इतनी सी है क़बूल करना,
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाहता हूँ मैं !
बस ख़ुशी हो हर पल और महके ये गुलशन सारा अभी ,
हर किसी के ग़म को अपना बनाना चाहता हूँ मैं !!

रुद्राष्टाध्यायी का आध्यात्मिक और आधिभौतिक अर्थ

  रुद्राष्टाध्यायी का आध्यात्मिक और आधिभौतिक अर्थ एक बात शुरुआत में स्पष्ट करना उपयोगी है— रुद्राष्टाध्यायी केवल भगवान शिव की स्तुति नहीं ह...