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Tuesday, April 7, 2009

आदमी की ज़ात बने 'तेजेन्द्र शर्मा'

हरेक शख्स को है प्यार अपने नग़मों से
यहां किसी के लिए वाह कौन कहता है;
वो शख्स जिसको ग़ुमां है कि वो ही बेहतर है
अकेला कांच के घर में ही बंद रहता है

कोई कहे मैं बाएं हाथ से ही लिखूंगा
मेरे सफ़ों पे तो मज़दूर या किसां होंगे;
मुझे तो भूख या ग़र्दिश से सिर्फ़ निस्बत है
जहां के दर्द मेरे हर्फ़ में अयां होंगे

कोई है और भी जो प्रेम का पुजारी है
कहे कि चाह में उसकी सदा मैं गाऊंगा;
मेरा हबीब ही मेरा ख़ुदा है सब जानें
उसी की याद में दिन रात मैं बिताऊंगा

किसी को प्यार है कुदरत के हर नज़ारे से
ज़मीं से, चांद से, सूरज से हर सितारे से;
कलम से उसके नई बात जब निकलती है
मचल के मिलती है हर मौज तब किनारे से

कि मैं ही मैं हूं, चलो सोच ऐसी दफ़न करें
हरिक को दाद मिले और कोई बात बने;
फ़िदा जो अपने पे होना हमारा छूटे तो
विवाद ख़त्म हो, और आदमी की जात बने

तो लिखा जाता है 'तेजेन्द्र शर्मा'

दिल में जब दर्द जगा हो, तो लिखा जाता है,
घाव सीने पे लगा हो, तो लिखा जाता है

ख़ुशी के दौर में लब गुनगुना ही लेते हैं
ग़म-ए-फ़ुरकत में भी गाओ, तो लिखा जाता है

हाल-ए-दिल खोल के रखना, तो बहुत आसां है
हाल-ए-दिल दिल में छुपा हो, तो लिखा जाता है

अपनी खु़द्दारी पे हम, लाख करें नाज़ ऐ दोस्त
अपनी हस्ती को मिटाओ, तो लिखा जाता है

गैर अपनों को बनाना, भी कोई होगा हुनर
गैरों को अपनी बनाओ, तो लिखा जाता है

बनी तस्वीर जो टूटे, तो गम तो होता है
टूटी तस्वीर बनाओ, तो लिखा जाता है

यूं तो इक रोज फ़ना, सबने ही होना है यहां
जान का दांव लगाओ, तो लिखा जाता है

लोग फिरते हैं यहां, पहने ख़ुदाई जामा
ख़ुद को इन्सान बनाओ, तो लिखा जाता है

इस उमर में दोस्तो 'तेजेन्द्र शर्मा'

इस उमर में दोस्तो, शैतान बहकाने लगा
जब रहे न नोश के काबिल, मज़ा आने लगा

जिस ज़माने ने किये सजदे,हमारे नाम पर
आज हम पर वो ज़माना, कहर है ढाने लगा

जब दफ़न माज़ी को करने की करें हम कोशिशें
ज़हन में उतना उभर कर सामने आने लगा

ज़िन्दगी भर जिन की ख़ातिर हम गुनाह ढोते रहे
उनकी ख़ुर्दगज़ी पे दिल, अब तरस है खाने लगा

चार सू जिनको कभी राहों में ठुकराते रहे
राह का हर एक पत्थर हमको ठुकराने लगा

ज़िन्गी के तौर ही बेतौर जब होने लगे
तब हमें हर तौर दोबारा, समझ आने लगे

‘तेज’ चक्कर वक्त का यूं ही रवां रहता सदा
कल का वीराना यहां, गुलशन है बन जाने लगा

कटी ज़िन्दगी पर लगाना ना आया 'तेजेन्द्र शर्मा'

कटी ज़िन्दगी पर लगाना ना आया
लगा ही लिया तो निभाना ना आया

खुदी की बुलंदी रहे नापते हम
कभी हस्ती अपनी मिटाना ना आया

गिरावट का देखा किए हम तमाशा
गो गिरते हुओं को उठाना ना आया

हसीं नक्श हर इक को मसला औ कुचला
अगर्चे कभी कुछ बनाना ना आया

रहे जिन्दगी भर यूं ही बस भटकते
कभी रस्ते सीधे पे जाना ना आया

गरज़ क़े लिए चाहे सब कुछ लुटा दें,
बिना गरज़ क़ुछ भी लुटाना ना आया

सही मान लें जिसको यह दुनियां वाले
समझ कोई ऐसा बहाना ना आया

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