बहुत कठिन है - बनना माँ
कोटि वंदना, तुझको माँ
पल पल अपनी देह काट कर
बुनना मेरी देह को - माँ
अपने आँचल की छाया में
भरना मुझको स्नेह से - माँ !
जीवन कठिन डगर, मगर है
सहज गुजरना, तुझसे माँ !!
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Sunday, December 5, 2010
Friday, January 16, 2009
सजा
गधा जानवर बड़े काम का,
जीवन जीता पर गुलाम का,
धोबी के डंडे से डरता,
सबसे ज्यादा मेहनत करता,
फ़िर भी कहते लोग गधा है,
सीधेपन की यही सजा है !!!
जीवन जीता पर गुलाम का,
धोबी के डंडे से डरता,
सबसे ज्यादा मेहनत करता,
फ़िर भी कहते लोग गधा है,
सीधेपन की यही सजा है !!!
Thursday, January 8, 2009
गति (स्वरचित)
जी करता है, कुछ लिखूं,
लिखता ही चला जाऊं,
जीवन एक अबूझ पहेली,
इसी बारी सुलझाऊं !
कैसे सृजन हुआ सृष्टि का,
कैसे बने सितारें ?
कैसे बने चाँद और सूरज,
कैसे अगणित तारें ?
किसने सोचा, किसने गूंथा
साँसों का ताना बाना ?
किसका निश्चय, चले निरंतर
यूँ आना, यूँ जाना ?
क्या यह सब कुछ, स्वयं नियंत्रित
या कोई और चलाता ?
कहते जिसको परम नियंता,
क्या कोई विश्व विधाता ?
मन, बुद्धि, चित, अहम् - सभी जड़,
चेतन किस विधि मिल जाता ?
निज -निज से नित-नित हो विस्मित,
सुख दुःख भ्रम निपजाता
यह संगम तो क्षण भर का उपक्रम,
फ़िर गुण - गुण में मिल जाता
तब क्या चेतन, विलग हो जड़ से
भ्रम से निवृत्ति पाता ?
या हो मोहित, उसी छद्म में
मुक्ति की आस; अकुलाता ?
लिखता ही चला जाऊं,
जीवन एक अबूझ पहेली,
इसी बारी सुलझाऊं !
कैसे सृजन हुआ सृष्टि का,
कैसे बने सितारें ?
कैसे बने चाँद और सूरज,
कैसे अगणित तारें ?
किसने सोचा, किसने गूंथा
साँसों का ताना बाना ?
किसका निश्चय, चले निरंतर
यूँ आना, यूँ जाना ?
क्या यह सब कुछ, स्वयं नियंत्रित
या कोई और चलाता ?
कहते जिसको परम नियंता,
क्या कोई विश्व विधाता ?
मन, बुद्धि, चित, अहम् - सभी जड़,
चेतन किस विधि मिल जाता ?
निज -निज से नित-नित हो विस्मित,
सुख दुःख भ्रम निपजाता
यह संगम तो क्षण भर का उपक्रम,
फ़िर गुण - गुण में मिल जाता
तब क्या चेतन, विलग हो जड़ से
भ्रम से निवृत्ति पाता ?
या हो मोहित, उसी छद्म में
मुक्ति की आस; अकुलाता ?
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साँस चलती है तुझेचलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों कादल गगन में गीत गाताचल रहा आकाश भी हैशून्य में भ्रमता-भ्रमाता पाँव के नीचे पड़ीअचल...