बिना टिकिट के
गंध लिफाफा
घर-भीतर तक डाल गया मौसम।
रंगों
डूबी-
दसों दिशाएँ
विजन
डुलाने-
लगी हवाएँ
दुनिया से
बेखौफ हवा में
चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
दिन
सोने की
सुघर बाँसुरी
लगी
फूँकने-
फूल-पाँखुरी,
प्यासे
अधरों पर खुद झुककर
भरी सुराही ढाल गया मौसम।
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Monday, February 2, 2009
पद-रज हुई 'इसाक अश्क'
पद-रज हुई
गुलाल
लगा फिर ऋतु फगुनाई है।
मादल की
थापें हों या हों-
वंशी की तानें
ऐसे में
क्या होगा यह तो
ईश्वर ही जानें
खिले आग के
फूल फूँकती
स्वर-शहनाई है।
गंध-पवन के
बेलगाम
शक्तिशाली झोंके
कौन भला
इनको जो बढकर
हाथों से रोके
रक्तिम
हुए कपोल
दिशा कुछ-यों शरमाई है।
गुलाल
लगा फिर ऋतु फगुनाई है।
मादल की
थापें हों या हों-
वंशी की तानें
ऐसे में
क्या होगा यह तो
ईश्वर ही जानें
खिले आग के
फूल फूँकती
स्वर-शहनाई है।
गंध-पवन के
बेलगाम
शक्तिशाली झोंके
कौन भला
इनको जो बढकर
हाथों से रोके
रक्तिम
हुए कपोल
दिशा कुछ-यों शरमाई है।
घटा 'इसाक अश्क'
बारिशों के पल
नया
जादू जगाते हैं।
तितलियाँ
लेकर उड़ीं-
संयम हवाओं में,
खिंच गए
सौ-सौ धनुष-
दृष्टि, दिशाओं में,
जुगनुओं से
याद के
खण्डहर सजाते हैं।
गंध बनकर
डोलती-
काया गुलाबों की,
पंक्तियाँ
जीवित हुई-
जैसे किताबों की,
गाछ-भी
यह देखकर
ताली बजाते हैं।
नया
जादू जगाते हैं।
तितलियाँ
लेकर उड़ीं-
संयम हवाओं में,
खिंच गए
सौ-सौ धनुष-
दृष्टि, दिशाओं में,
जुगनुओं से
याद के
खण्डहर सजाते हैं।
गंध बनकर
डोलती-
काया गुलाबों की,
पंक्तियाँ
जीवित हुई-
जैसे किताबों की,
गाछ-भी
यह देखकर
ताली बजाते हैं।
दूर क्षितिज तक 'इसाक अश्क'
दूर क्षितिज तक
टेसू वन में बिना धुएँ की
आग लगाए हैं।
हवा
हवा में पंख तौल-
इतराती है,
रात
रात भर जाने क्या-क्या
गाती है,
रस की
प्रलय-बाढ में जैसे
सब डूबे-उतराए हैं।
पत्ते
नृत्य-कथा का
मंचन करते हैं,
धूल
शशि पर फूल
बाँह में भरते हैं,
मौसम ही
यह नहीं दृष्टि भर
पाहन तक मदिराए हैं।
टेसू वन में बिना धुएँ की
आग लगाए हैं।
हवा
हवा में पंख तौल-
इतराती है,
रात
रात भर जाने क्या-क्या
गाती है,
रस की
प्रलय-बाढ में जैसे
सब डूबे-उतराए हैं।
पत्ते
नृत्य-कथा का
मंचन करते हैं,
धूल
शशि पर फूल
बाँह में भरते हैं,
मौसम ही
यह नहीं दृष्टि भर
पाहन तक मदिराए हैं।
देखिये-तो 'इसाक अश्क'
देखिये-तो
किस कदर फिर
आम-अमियों बौर आए।
धूप
पीली चिट्ठियाँ
घर आँगनों में,
डाल
हँसती-गुनगुनाती है-
वनों में,
पास कलियों
फूल-गंधों के
सिमट सब छोर आए।
बंदिशें
टूटीं प्रणय के-
रंग बदले,
उम्र चढती
जन्दगी के-
ढंग बदले,
ठेठ घर में
घुस हृदय के
रूप-रस के चोर आए।
किस कदर फिर
आम-अमियों बौर आए।
धूप
पीली चिट्ठियाँ
घर आँगनों में,
डाल
हँसती-गुनगुनाती है-
वनों में,
पास कलियों
फूल-गंधों के
सिमट सब छोर आए।
बंदिशें
टूटीं प्रणय के-
रंग बदले,
उम्र चढती
जन्दगी के-
ढंग बदले,
ठेठ घर में
घुस हृदय के
रूप-रस के चोर आए।
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