बाबा! यह खुशबू क्या होती
पूछेगी कल मेरी पोती
तुम ने लिखा कि गीत तुम्हारा
खुशबू वाला शिलालेख है
उषा के अरुणिम अधरों पर
चंदनगंधी स्वर्ण रेख है
मरणशील इस धरा धाम पर
तुम हो कालजयी यायावर
दुनिया के सारे रत्नों से
मूल्यवान गीतों के अक्षर
फिर भी बुआ दहेज पीड़िता है
अपनी अम्मा क्यों है रोती
भावों के खिलते उपवन में
तुम गीतों की हरित पाँखुरी
शब्दों के स्वर के शिल्पी तुम
कान्हा की रसभरी बाँसुरी
झूठ दशानन के विरुद्ध तुम
सत्य राम के उद्दीपक हो
हर अँधियारे की छाती पर
जल उठने वाले दीपक हो
हर मशाल आँखों के आगे
फिर भी रही ज्योति क्यों खोती
प्यासों ने जब पानी माँगा
तुम ने गाईं मेघ मल्हारें
बिकी भूख में विवश जवानी
तुम तक पहुँची नहीं पुकारें
भोले बचपन को खाया जब
शोषण के आदमखोरों ने
लूट लिया जब सारे घर को
मालिक बनकर कुछ चोरों ने
तब भी क्यों रह गई तुम्हारी
यह वाचाल लेखनी सोती
समझो बाबा गीत वही है
जो दुखियों की पीड़ा गाए
सच के लिए झूठ के सम्मुख
विंध्याचल बनकर डट जाए
थके पसीने के अधरों पर
मुस्कानों के फूल खिला दे
सूखे मरुथल-सी आँखों में
जो आशा का नीर पिला दे
सरस्वती के कंठहार का
गीत वही होता है मोती
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Saturday, October 10, 2009
केसर चंदन पानी के दिन - राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
केसर, चंदन, पानी के दिन
लौटें चूनर धानी के दिन
झाँझें झंकृत हो जातीं थीं
जब मधुर मृदंग ठनकते थे
जब प्रणय–राग की तालों पर
नूपुर अनमोल खनकते थे
साँसें सुरभित हो जाती थीं
मोहिनी मलय की छाया में
कुंजों पर मद उतराता था
फागुन के मद की माया में
उस महारास की मुद्रा में
कान्हा राधा रानी के दिन
कटु नीम तले की छाया जब
मीठे अहसास जगाती थी
मेहनत की धूप तपेतन में
रस की गंगा लहराती थी
वे बैन, सैन, वे चतुर नैन
जो भरे भौन बतराते थे
अधरों के महके जवाकुसुम
बिन खिले बात कह जाते थे
मंजरी, कोकिला, अमलतास
ऋतुपति की अगवानी के दिन
फैली फसलों पर भोर–किरन
जब कंचन बिख़रा जाती थी
नटखट पुरवा आरक्त कपोलों
का घूँघट सरकाती थी
रोली, रंगोली, सतिये थे
अल्पना द्वार पर हँसता था
होली, बोली, ठिठोलियाँ थीं
प्राणों में फागुन बसता था
फिर गाँव गली चौबारों में
खुशियों की मेहमानी के दिन
लौटें चूनर धानी के दिन
झाँझें झंकृत हो जातीं थीं
जब मधुर मृदंग ठनकते थे
जब प्रणय–राग की तालों पर
नूपुर अनमोल खनकते थे
साँसें सुरभित हो जाती थीं
मोहिनी मलय की छाया में
कुंजों पर मद उतराता था
फागुन के मद की माया में
उस महारास की मुद्रा में
कान्हा राधा रानी के दिन
कटु नीम तले की छाया जब
मीठे अहसास जगाती थी
मेहनत की धूप तपेतन में
रस की गंगा लहराती थी
वे बैन, सैन, वे चतुर नैन
जो भरे भौन बतराते थे
अधरों के महके जवाकुसुम
बिन खिले बात कह जाते थे
मंजरी, कोकिला, अमलतास
ऋतुपति की अगवानी के दिन
फैली फसलों पर भोर–किरन
जब कंचन बिख़रा जाती थी
नटखट पुरवा आरक्त कपोलों
का घूँघट सरकाती थी
रोली, रंगोली, सतिये थे
अल्पना द्वार पर हँसता था
होली, बोली, ठिठोलियाँ थीं
प्राणों में फागुन बसता था
फिर गाँव गली चौबारों में
खुशियों की मेहमानी के दिन
मन घनश्याम हो गया - राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
जब से मन घनश्याम हो गया
तन वृंदावन धाम हो गया
राधा के मुख से जो निकला
वही कृष्ण का नाम हो गया
तन की तपन मिली है तन को
जख़्मों में आराम हो गया
प्रीति रही बदनाम सदा से
लेकिन मेरा नाम हो गया
वे कालिख पीकर भी उजले
वक्त स्वयं बदनाम हो गया
तुम ने जिस क्षण छुआ दृष्टि से
सारा जग अभिराम हो गया
अल्प विराम मृत्यु को जग ने
समझा पूर्ण विराम हो गया
सब गुलाम राजा बन बैठे
राजा मगर गुलाम हो गया
तुम ने आँखों से क्या ढाली
'यायावर' ख़ैयाम हो गया
तन वृंदावन धाम हो गया
राधा के मुख से जो निकला
वही कृष्ण का नाम हो गया
तन की तपन मिली है तन को
जख़्मों में आराम हो गया
प्रीति रही बदनाम सदा से
लेकिन मेरा नाम हो गया
वे कालिख पीकर भी उजले
वक्त स्वयं बदनाम हो गया
तुम ने जिस क्षण छुआ दृष्टि से
सारा जग अभिराम हो गया
अल्प विराम मृत्यु को जग ने
समझा पूर्ण विराम हो गया
सब गुलाम राजा बन बैठे
राजा मगर गुलाम हो गया
तुम ने आँखों से क्या ढाली
'यायावर' ख़ैयाम हो गया
विवेकानंद दोहे - राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
उठो, जगो, आगे बढ़ो, पाओ जीवन-साध्य।
तुमने कहा कि राष्ट्र ही, एकमेव आराध्य।।
साँस-साँस में राष्ट्रहित, शब्द-शब्द में ज्ञान।
राष्ट्रवेदिका पर किए, अर्पित तन मन प्राण।।
सत्य और संस्कृति हुए, पाकर तुम्हें महान।
कदम मिलाकर चल पड़े, धर्म और विज्ञान।।
देव संस्कृति का किया, तप-तप कर उत्थान।
करता है दिककाल भी, ॠषि तेरा जयगान।।
अनथक यात्री ने कभी, लिया नहीं विश्राम।
दिशा-दिशा के वक्ष पर, लिखा तुम्हारा नाम।।
रोम-रोम पुलकित हुआ, गाकर दिव्य चरित्र।
जन्म तुम्हें देकर हुई, भारत भूमि पवित्र।।
संत विवेकानंद तुम, शुभ-संस्कृति का कोष।
गुँजा दिया इस सृष्टि में, भारत का जय घोष।।
तुमने कहा कि राष्ट्र ही, एकमेव आराध्य।।
साँस-साँस में राष्ट्रहित, शब्द-शब्द में ज्ञान।
राष्ट्रवेदिका पर किए, अर्पित तन मन प्राण।।
सत्य और संस्कृति हुए, पाकर तुम्हें महान।
कदम मिलाकर चल पड़े, धर्म और विज्ञान।।
देव संस्कृति का किया, तप-तप कर उत्थान।
करता है दिककाल भी, ॠषि तेरा जयगान।।
अनथक यात्री ने कभी, लिया नहीं विश्राम।
दिशा-दिशा के वक्ष पर, लिखा तुम्हारा नाम।।
रोम-रोम पुलकित हुआ, गाकर दिव्य चरित्र।
जन्म तुम्हें देकर हुई, भारत भूमि पवित्र।।
संत विवेकानंद तुम, शुभ-संस्कृति का कोष।
गुँजा दिया इस सृष्टि में, भारत का जय घोष।।
लड़ते-लड़ते मन हार गया - राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
यह जीवन है संग्राम प्रबल
लड़ना ही है प्रतिक्षण प्रतिपल
जिस ने मन में गीता गुनली वह हार–जीत के पार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया
संख्या बल कभी नहीं लड़ता
लड़ते हैं सौ या पाँच कहाँ
सच के पथ पर निर्भीक बढ़ो
नहीं साँच को आँच यहाँ
जो चक्रव्यूह गढ़ते, उन के माथे पर लिखा मरण देखा
जो सुई नोंक भर भूमि न दें, उन का भी दीन क्षरण देखा
छल के साथ छली का तन, मन, चिंतन, अशुभ विचार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया
संकल्पों से टकराने में
हर बार झिझकती झंझायें
झरने की तूफ़ानी गति को
कब रोक सकीं पथ–बाधायें
जो लड़ते हैं वे कल्पकथा बनकर जीते इतिहासों में
सदियों के माथे का चुंबन बनकर जीते अहसासों में
कवि का संवेदन विनत हुआ जब–जब भी उनके द्वार गया
वह हार गया रण में जिसका लड़ते–लड़ते मन हार गया
लड़ना ही है प्रतिक्षण प्रतिपल
जिस ने मन में गीता गुनली वह हार–जीत के पार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया
संख्या बल कभी नहीं लड़ता
लड़ते हैं सौ या पाँच कहाँ
सच के पथ पर निर्भीक बढ़ो
नहीं साँच को आँच यहाँ
जो चक्रव्यूह गढ़ते, उन के माथे पर लिखा मरण देखा
जो सुई नोंक भर भूमि न दें, उन का भी दीन क्षरण देखा
छल के साथ छली का तन, मन, चिंतन, अशुभ विचार गया
वह हार गया रण में जिस का लड़ते–लड़ते मन हार गया
संकल्पों से टकराने में
हर बार झिझकती झंझायें
झरने की तूफ़ानी गति को
कब रोक सकीं पथ–बाधायें
जो लड़ते हैं वे कल्पकथा बनकर जीते इतिहासों में
सदियों के माथे का चुंबन बनकर जीते अहसासों में
कवि का संवेदन विनत हुआ जब–जब भी उनके द्वार गया
वह हार गया रण में जिसका लड़ते–लड़ते मन हार गया
Saturday, February 14, 2009
दिल में गुलशन - राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
दिल में गुलशन आंख में सपना सुहाना रख।
आस्मां की डालियों पर आशियाना रख।।
हर कदम पर एक मुश्किल ज़िंदगी का नाम।
फिर से मिलने का मगर कोई बहाना रख।।
अर्थ में भर अर्थ की अभिव्यंजना का अर्थ।
शक की सीमा के आगे भी निशाना रख।।
कफ़स का ये द्वार टूटेगा नहीं सच है, मगर।
हौसला रख अपना ये पर फड़फ़ड़ाना रख।।
तेरे जाने के पर जिसे दुहराएगी महफ़िल।
वक्त की आंखों में एक ऐसा फसाना रख।।
दर्द की दौलत से यायावर हुआ है तू।
पांव की ठोकर के आगे ये ज़माना रख।।
आस्मां की डालियों पर आशियाना रख।।
हर कदम पर एक मुश्किल ज़िंदगी का नाम।
फिर से मिलने का मगर कोई बहाना रख।।
अर्थ में भर अर्थ की अभिव्यंजना का अर्थ।
शक की सीमा के आगे भी निशाना रख।।
कफ़स का ये द्वार टूटेगा नहीं सच है, मगर।
हौसला रख अपना ये पर फड़फ़ड़ाना रख।।
तेरे जाने के पर जिसे दुहराएगी महफ़िल।
वक्त की आंखों में एक ऐसा फसाना रख।।
दर्द की दौलत से यायावर हुआ है तू।
पांव की ठोकर के आगे ये ज़माना रख।।
Friday, May 23, 2008
दिल में गुलशन ... राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
दिल में गुलशन आंख में सपना सुहाना रख।
आस्मां की डालियों पर आशियाना रख।।
हर कदम पर एक मुश्किल ज़िंदगी का नाम।
फिर से मिलने का मगर कोई बहाना रख।।
अर्थ में भर अर्थ की अभिव्यंजना का अर्थ।
शक की सीमा के आगे भी निशाना रख।।
कफ़स का ये द्वार टूटेगा नहीं सच है, मगर।
हौसला रख अपना ये पर फड़फ़ड़ाना रख।।
तेरे जाने के पर जिसे दुहराएगी महफ़िल।
वक्त की आंखों में एक ऐसा फसाना रख।।
दर्द की दौलत से यायावर हुआ है तू।
पांव की ठोकर के आगे ये ज़माना रख।।
आस्मां की डालियों पर आशियाना रख।।
हर कदम पर एक मुश्किल ज़िंदगी का नाम।
फिर से मिलने का मगर कोई बहाना रख।।
अर्थ में भर अर्थ की अभिव्यंजना का अर्थ।
शक की सीमा के आगे भी निशाना रख।।
कफ़स का ये द्वार टूटेगा नहीं सच है, मगर।
हौसला रख अपना ये पर फड़फ़ड़ाना रख।।
तेरे जाने के पर जिसे दुहराएगी महफ़िल।
वक्त की आंखों में एक ऐसा फसाना रख।।
दर्द की दौलत से यायावर हुआ है तू।
पांव की ठोकर के आगे ये ज़माना रख।।
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