हमारे सारे के सारे दिन
नष्ट नहीं हो जाते
कहीं एक दिन बच निकलता है
और जीवित रहता है
हवा,पानी, धूप, तूफान,काल
सब से लड़ता रहता है
लड़ते-लड़ते दूर तक निकल जाता है
सभी दिन तितली नहीं होते
कोई दिन तितली की तरह
पन्नों के बीच बच निकलता है
और क्षण-भंगुरता को चकमा दे जाता है
दिन
जिसमें मैं जीता हूँ
मेरा अपना नहीं हो पाता
मुट्ठी की रेत हो जाता है
पर वह दिन
जो बादलों की पीठ पर चढ़ कर
घूम आता है पर्वत–पर्वत
जीवित रहेगा बहुत दिनों
चीड़ और देवदार की गंध
आती रहेगी बरसों तक
उसके कोट से
मुझे अच्छा लगता है
जब बर्फ़ में ठिठुर रहे दिनों से
मैं उठा लाता हूँ एक दिन
गर्म पानी में हाथ-पाँव धुला कर
आग के पास बैठता हूँ
और शब्दों का एक गर्म-सा कंबल ओढ़ाता हूँ।
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Sunday, April 5, 2009
अंदर और बाहर बसी दुनिया 'तेज राम शर्मा'
यहाँ
मेरे अंदर बसती है एक दुनिया
ओर-छोर नहीं दिखता जिसका
बादलों की तरह उमड़ती है आकाश में
असंख्य चित्र बनाती और गिराती चली जाती है
मैं आकाश जैसे चित्रपट पर
बादल जैसी कल्पनाओं की
अठखेलियाँ देखता रहता हूँ
जहाँ मोरपंख हैं
हरियाली है
तितलियां हैं
पारदर्शी जल के नीचे
रंग-बिरंगी मछलियाँ हैं
वहाँ
मेरे बाहर बसती है एक दुनिया
पत्थर सी ठोस है
रेत-सी फैली है
धुएँ–सी आँखों को मलती है
रोटी जितनी गोल है
काली गुफ़ा सी मोहक है
जहाँ झरोखे जितना आकाश है
कापी के पन्नों को बाच दबे
तितली के पँखों जैसे सपने हैं
मैं अंदर और बाहर की दुनिया को
अक्षर-अक्षर नापता
दुर्गम चोटी की
अर्थहीन यात्रा पर निकलता हूँ
चोटी से जब पुकारता हूँ
तो मेरे शब्द निर्जन जंगल में गूँजकर
मेरे पास लौट आते हैं
रंगीन बादल
मेरे लिए बुनते हैं एक पैराशूट
जिसे थाम भरता हूँ एक अर्थहीन उड़ान
नदी किनारे की किसी अज्ञात चरागाह में
धराशायी होने को।
मेरे अंदर बसती है एक दुनिया
ओर-छोर नहीं दिखता जिसका
बादलों की तरह उमड़ती है आकाश में
असंख्य चित्र बनाती और गिराती चली जाती है
मैं आकाश जैसे चित्रपट पर
बादल जैसी कल्पनाओं की
अठखेलियाँ देखता रहता हूँ
जहाँ मोरपंख हैं
हरियाली है
तितलियां हैं
पारदर्शी जल के नीचे
रंग-बिरंगी मछलियाँ हैं
वहाँ
मेरे बाहर बसती है एक दुनिया
पत्थर सी ठोस है
रेत-सी फैली है
धुएँ–सी आँखों को मलती है
रोटी जितनी गोल है
काली गुफ़ा सी मोहक है
जहाँ झरोखे जितना आकाश है
कापी के पन्नों को बाच दबे
तितली के पँखों जैसे सपने हैं
मैं अंदर और बाहर की दुनिया को
अक्षर-अक्षर नापता
दुर्गम चोटी की
अर्थहीन यात्रा पर निकलता हूँ
चोटी से जब पुकारता हूँ
तो मेरे शब्द निर्जन जंगल में गूँजकर
मेरे पास लौट आते हैं
रंगीन बादल
मेरे लिए बुनते हैं एक पैराशूट
जिसे थाम भरता हूँ एक अर्थहीन उड़ान
नदी किनारे की किसी अज्ञात चरागाह में
धराशायी होने को।
ओ मेरे जीवन 'तेज राम शर्मा'
ओ मेरे जीवन
तू अखरोट की पत्तियों-सा झड़
तुम्हारी टहनियों के बीच से
धूप पहुँचे जीवन की
ठिठुरन तक
तू अंगेठे में
लोहधान-सा तप
हाँडी की खुद-बुद महक
फैले घर भर में
तू बरसात की अंधेरी रात में
जुगनू भर
आलोक बन
तू किसी की नींद में
रंगीन-सा सपना बन
तू आततायी के चेहरे पर
घाव का पक्का निशान बन
उसकी नाक पर
बार-बार बैठ मक्खी की तरह
तू बसंत की समृति-सा
बंदनवार रस्सी के बट बीच
बरुस के फूल-सी
अपनी रंगत बनाए रख
तू ड्योढ़ी से अपने नाम की पुकार
की इंतजार मत कर
न ही अपने को सिद्ध करने के लिए
अंधेरी ग़ुफा के सामने
ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला अपना नाम
तुम्हारे नाम की प्रतिध्वनियाँ
तुम्हारे अकेले पड़ जाने के दर्द को
और गहरा कर देंगी
तू बस बुझने से पहले
जल की पावन धारा में
विसर्जित दीप-सा बह।
तू अखरोट की पत्तियों-सा झड़
तुम्हारी टहनियों के बीच से
धूप पहुँचे जीवन की
ठिठुरन तक
तू अंगेठे में
लोहधान-सा तप
हाँडी की खुद-बुद महक
फैले घर भर में
तू बरसात की अंधेरी रात में
जुगनू भर
आलोक बन
तू किसी की नींद में
रंगीन-सा सपना बन
तू आततायी के चेहरे पर
घाव का पक्का निशान बन
उसकी नाक पर
बार-बार बैठ मक्खी की तरह
तू बसंत की समृति-सा
बंदनवार रस्सी के बट बीच
बरुस के फूल-सी
अपनी रंगत बनाए रख
तू ड्योढ़ी से अपने नाम की पुकार
की इंतजार मत कर
न ही अपने को सिद्ध करने के लिए
अंधेरी ग़ुफा के सामने
ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला अपना नाम
तुम्हारे नाम की प्रतिध्वनियाँ
तुम्हारे अकेले पड़ जाने के दर्द को
और गहरा कर देंगी
तू बस बुझने से पहले
जल की पावन धारा में
विसर्जित दीप-सा बह।
बदल रहा है सब कुछ 'तेज राम शर्मा'
बदल गए हैं चाँद नक्षत्र, तारे
पृथ्वी सिकुड़ कर
टेबल पर दुबक गई है
घट रहा है सब कुछ
मेरी आँखों के सामने
दीवारों को लाँघ कर हर चीख़
पहुँच रही है मेरे कानों तक
दर्द बदल गए हैं
बदल गए हैं नाख़ूनों के रंग
तलवार की धार बहुत तेज़ है
पृथ्वी को काट गई है
दो हिस्सों में
सपने सब बदल गए हैं
सिमट गए हैं वे
पश्चिमी आकाश के किसी कोने में
धुआँ रसोई से निकल कर
अंतरिक्ष में फैल गया है
साँसों की गति बदल रही है
मेरी बावली उतावली सदी बदल रही है
बदल गया है नदियों का जल
जंगल का आकार
तटों का रंग
और उसी छोटी-सी देह में
आदमी बदल गया है
बदल गए हैं
अपने को धोखा देने के उसके ढंग।
पृथ्वी सिकुड़ कर
टेबल पर दुबक गई है
घट रहा है सब कुछ
मेरी आँखों के सामने
दीवारों को लाँघ कर हर चीख़
पहुँच रही है मेरे कानों तक
दर्द बदल गए हैं
बदल गए हैं नाख़ूनों के रंग
तलवार की धार बहुत तेज़ है
पृथ्वी को काट गई है
दो हिस्सों में
सपने सब बदल गए हैं
सिमट गए हैं वे
पश्चिमी आकाश के किसी कोने में
धुआँ रसोई से निकल कर
अंतरिक्ष में फैल गया है
साँसों की गति बदल रही है
मेरी बावली उतावली सदी बदल रही है
बदल गया है नदियों का जल
जंगल का आकार
तटों का रंग
और उसी छोटी-सी देह में
आदमी बदल गया है
बदल गए हैं
अपने को धोखा देने के उसके ढंग।
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