गले में बाहें डाले चैन से सोना जवानी में।
कहाँ मुमकिन फिर ऐसा ख़्वाब देखूँ ज़िन्दगानी में॥
ग़नीमत जान उस कूचे में थककर बैठ जाने को।
किसे दम भर मिला आराम दौरे-आसमानी में॥
यकसाँ कभी किसी की न गुज़री ज़माने में।
यादश बख़ैर बैठे थे कल आशियाने में॥
सदमा दिया तो सब्र की दौलत भी देगा वो।
किस चीज़ की कमी है सख़ी के ख़ज़ाने में॥
अफ़सुर्दा ख़ातिरों की ख़िज़ाँ क्या, बहार क्या।
कुंजे-क़फ़स में मर रहे या आशियाने में॥
हम ऐसे बदनसीब कि अब तक न मर गये।
आँखों के आगे आग लगी आशियाने में।
दीवाने बनके उनके गले से लिपट भी जाओ।
काम अपना कर लो ‘यास’ बहाने-बहाने में॥
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Saturday, December 25, 2010
ज़माना ख़ुदा को खु़दा जानता है 'यगाना चंगेज़ी'
ज़माना खु़दा को ख़ुदा जानता है।
यही जानता है तो क्या जानता है॥
वो क्यों सर खपाए तेरी जुस्तजू में।
जो अंजामे-फ़िक्रेरसा जानता है॥
ख़ुदा ऐसे बंदों से क्यों फिर न जाए।
जो बैठा हुआ माँगना जानता है॥
वो क्यों फूल तोड़े वो क्यों फूल सूँघे?
जो दिल का दुखाना बुरा जानता है॥
यही जानता है तो क्या जानता है॥
वो क्यों सर खपाए तेरी जुस्तजू में।
जो अंजामे-फ़िक्रेरसा जानता है॥
ख़ुदा ऐसे बंदों से क्यों फिर न जाए।
जो बैठा हुआ माँगना जानता है॥
वो क्यों फूल तोड़े वो क्यों फूल सूँघे?
जो दिल का दुखाना बुरा जानता है॥
Thursday, February 5, 2009
किसकी आवाज़ कान में आई 'यगाना चंगेज़ी'
किसकी आवाज़ कान में आई
दूर की बात ध्यान में आयी
आप आते रहे बुलाते रहे
आने वाली एक आन में आयी
यह किनारा चला कि नाव चली
कहिये क्या बात ध्यान में आयी!
इल्म क्या इल्म की हकीक़त क्या
जैसी जिसके गुमान में आयी
आँख नीचे हुई अरे यह क्या
यूं गरज़ दरम्यान में आयी
मैं पयम्बर नहीं यगाना सही
इस से क्या कसर शान में आयी
दूर की बात ध्यान में आयी
आप आते रहे बुलाते रहे
आने वाली एक आन में आयी
यह किनारा चला कि नाव चली
कहिये क्या बात ध्यान में आयी!
इल्म क्या इल्म की हकीक़त क्या
जैसी जिसके गुमान में आयी
आँख नीचे हुई अरे यह क्या
यूं गरज़ दरम्यान में आयी
मैं पयम्बर नहीं यगाना सही
इस से क्या कसर शान में आयी
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