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Thursday, April 16, 2009

आत्म-समर्पण 'रामकुमार वर्मा'

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

यह न मुझसे पूछना, मैं किस दिशा से आ रहा हूँ
है कहाँ वह चरणरेखा, जो कि धोने जा रहा हूँ
पत्थरों की चोट जब उर पर लगे,
एक ही "कलकल" कहो, तो ले चलूँ

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

मार्ग में तुमको मिलेंगे वात के प्रतिकूल झोंके
दृढ़ शिला के खण्ड होंगे दानवों से राह रोके
यदि प्रपातों के भयानक तुमुल में,
भूल कर भी भय न हो, तो ले चलूँ

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

हो रहीं धूमिल दिशाएँ, नींद जैसे जागती है
बादलों की राशि मानो मुँह बनाकर भागती है
इस बदलती प्रकृति के प्रतिबिम्ब को,
मुस्कुराकर यदि सहो, तो ले चलूँ

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

मार्ग से परिचय नहीं है, किन्तु परिचित शक्ति तो है
दूर हो आराध्य चाहे, प्राण में अनुरक्ति तो है
इन सुनहली इंद्रियों को प्रेम की,
अग्नि से यदि तुम दहो, तो ले चलूँ

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

वह तरलता है हृदय में, किरण को भी लौ बना दूँ
झाँक ले यदि एक तारा, तो उसे मैं सौ बना दूँ
इस तरलता के तरंगित प्राण में,
प्राण बनकर यदि रहो, तो ले चलूँ

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ

किरण–कण 'रामकुमार वर्मा'

एक दीपक किरण–कण हूँ।

धूम्र जिसके क्रोड़ में है¸ उस अनल का हाथ हूँ मैं
नव प्रभा लेकर चला हूँ¸ पर जलन के साथ हूँ मैं
सिद्धि पाकर भी¸ तुम्हारी साधना का —
ज्वलित क्षण हूँ।
एक दीपक किरण–कण हूँ।

व्योम के उर में¸ अपार भरा हुआ है जो अंधेरा
और जिसने विश्व को¸ दो बार क्या¸ सौ बार घेरा
उस तिमिर का नाश करने के लिए¸ —
मैं अटल प्रण हूँ।
एक दीपक किरण–कण हूँ।

शलभ को अमरत्व देकर¸ प्रेम पर मरना सिखाया
सूर्य का संदेश लेकर¸ रात्रि के उर में समाया
पर तुम्हारा स्नेह खोकर भी¸ —
तुम्हारी ही शरण हूँ।
एक दीपक किरण–कण हूँ।

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