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Tuesday, July 7, 2009

या लकुटी अरु कामरिया 'रसखान'


या लकुटी अरु कामरिया पर,
राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख,
नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों,
ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम,
करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

मानुस हौं तो वही 'रसखान'


मानुस हौं तो वही रसखान,
बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो,
चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को,
जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि,
कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

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