या लकुटी अरु कामरिया पर,
राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख,
नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों,
ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम,
करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
रुद्राष्टाध्यायी का आध्यात्मिक और आधिभौतिक अर्थ एक बात शुरुआत में स्पष्ट करना उपयोगी है— रुद्राष्टाध्यायी केवल भगवान शिव की स्तुति नहीं ह...
रसखान की इन मुग्ध करती कालजयी पंक्तियों के लिये धन्यवाद ।
ReplyDelete'कोटिक हू कलधौत के धाम,
ReplyDeleteकरील के कुंजन ऊपर वारौं॥'
- अटूट श्रद्घा और पूर्ण समर्पण का नमूना.