प्राणों के पिंजरे में पाला,
साँस-साँस में गाया,
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।
साँझ-सकारे मन-बंसी पर मैंने उसको टेरा,
रसना की रेशमी धार पर दिन दुपहरिया फेरा,
अक्षर-मंत्र, शब्द के टोने, स्वर के बान चलाए
धीरे-धीरे उस निर्मम से कुछ अपनापा पाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।
जाने किस अनुराग पगीं उसकी रतनारी आँखें,
किस पीड़ा के नील रंग में रंगी हुई हैं पांखें,
उसके गहरे प्रेमराग को बूझ न पाया अब तक
अतुल स्नेह से उसके पंखों को हर क्षण सहलाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।
उसके रोम-रोम में महके वन-फूलों की प्रीत,
उसकी हर थिरकन में गूँजे घाटी का संगीत,
उसकी बोली में गूंगा आकाश मुखर हो जाए
मैंने शब्द-तूलिका से उसका यह चित्र बनाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।
No more noisy, loud words from me---such is my master's will. Henceforth I deal in whispers.
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Sunday, May 31, 2009
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रुद्राष्टाध्यायी का आध्यात्मिक और आधिभौतिक अर्थ
रुद्राष्टाध्यायी का आध्यात्मिक और आधिभौतिक अर्थ एक बात शुरुआत में स्पष्ट करना उपयोगी है— रुद्राष्टाध्यायी केवल भगवान शिव की स्तुति नहीं ह...
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