Saturday, May 24, 2008

पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे ... "ठाकुरप्रसाद सिंह"


पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

साखू की डाल पर उदासे मन
उन्मन का क्या होगा
पात-पात पर अंकित चुम्बन
चुम्बन का क्या होगा
मन-मन पर डाल दिए बन्धन
बन्धन का क्या होगा
पात झरे, गलियों-गलियों बिखरे

कोयलें उदास मगर फिर-फिर वे गाएंगी
नए-नए चिन्हों से राहें भर जाएंगी
खुलने दो कलियों की ठिठुरी ये मुट्ठियाँ
माथे पर नई-नई सुबहें मुस्काएंगी

गगन-नयन फिर-फिर होंगे भरे
पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे

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